Law of demand and supply
Law of supply आपूर्ति का नियम :-
आपूर्ति का नियम यह प्रदर्शित करता है, कि जब अन्य सभी कारक स्थिर हो तब किसी वस्तु की कीमत और उसकी आपूर्ति के बीच सीधा संबंध होता है। यानी जब कीमत बढती है, तो उसकी आपूर्ति भी बढती है। और जब उसकी कीमत कम होती है तो उसकी आपूर्ति भी कम हो जाती है। अर्थात अलग-अलग कीमत पर विक्रेता अपने उत्पादन की अलग-अलग मात्रा की आपूर्ति करने की प्रवृत्ति रखते है। इसे आपूर्ति का नियम कहते हैं।
मांग के नियम में हमने देखा की कीमत बढ़ने से उसकी मांग में कमी आ जाती है। लेकिन पूर्ति के नियम में यह बिल्कुल उल्टा है।क्योंकि मांग के नियम में सीधे उपभोक्ता होते हैं, जो कीमत बढ़ने पर मांग कम कर देते हैं, लेकिन आपूर्ति के नियम में औद्योगिक एवं व्यवसायी व्यक्ति होते हैं। जिन्हें कीमत बढ़ने पर अधिक लाभ होता है, इसलिए वह और अधिक उत्पादन करते हैं तथा अधिक आपूर्ति करते हैं।
आइये हम इसे एक सारणिक रूप में समझते हैं -
कीमत ₹
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आपूर्ति मात्रा kg
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10
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100
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20
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200
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30
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300
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40
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400
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जब सेब की कीमत और आपूर्ति को तालिका में लिखते हैं। सेव की कीमत ₹10 थी तो आपूर्ति की मात्रा 100kg होती है। इसी प्रकार जब सेब की कीमत ₹20 हो जाती है तो आपूर्ति की मात्रा भी बढ़ कर 200kg को जाएगी। इसी प्रकार जैसे-जैसे कीमत बढ़ती है व्यक्ति अपने उत्पादन को और अधिक बढ़ाने की कोशिश करता है। लेकिन जब सेब की कीमत कम हो जाती है तो वह उद्यमी सेब की जगह किसी अन्य फल या दालों की पैदावार करने लगेगा जिससे सेव की आपूर्ति कम हो जाएगी। इससे आपूर्ति व कीमत का सीधा संबंध स्थापित हो जाता है।
सारणिक रूप से जब हम देखते हैं तो जैसे-जैसे कीमत बढ़ती है।आपूर्ति की मात्रा भी वैसे वैसे बढ़ती रहती है।
किसी वस्तु की कीमत और आपूर्ति की मात्रा के संबंध को सारणिक रूप में प्रदर्शित करना आपूर्ति अनुसूची (supply schedule) कहलाता है।
Supply curve
आपूर्ति वक्र :-
किसी वस्तु की कीमत और उसकी आपूर्ति की जो मात्रा को जब हमने सारणिक रूप से एक वक्र में प्रदर्शित किया तो वह आपूर्ति वक्र बन जाता है।
आइये आपूर्ति वक्र देखते हैं -
वक्र में हम देख सकते हैं जैसे जैसे सेब के प्राइस बढ़ते हैं वैसे वैसे वक्र बाएं से दाएं ऊपर की ओर उठता है अर्थात आपूर्ति वक्र का ढाल बाएं से दाएं ऊपर की ओर होता है।
Forces behind market supply
बाजार आपूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्व :-
उत्पादन लागत (production cost) - जब किसी वस्तु की उत्पादन लागत बाजार मूल्य के तुलना में कम होती है, तो यह उत्पादक के लिए फ़ायदेमंद होता है। इसलिए वह उस वस्तु का अधिक उत्पादन करता है और आपूर्ति की भी मात्रा बढ़ा देता है। अगर उत्पादन लागत उस वस्तु की बाजार कीमत के मुक़ाबले अधिक होती है, तो व्यापारी उसका उत्पादन कम कर देता है या उसका उत्पादन ही बंद कर देता है। उत्पादन लागत आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्नत प्रौद्योगिकी (advanced technology) - जब कोई व्यवसायी उन्नत प्रौद्योगिकी से उत्पादन करता है, तो उस उत्पाद की गुणवत्ता तथा उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है। तथा उसकी उत्पादन लागत में भी कमी आती है। जिससे वह अधिक उत्पादन तथा आपूर्ति कर सकता है। यदि कोई व्यवसाय उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रयोग नहीं करता है, उसे अधिक मजदूरों की आवश्यकता होगी जिससे उसकी उत्पादन लागत बढ़ जाती है। तथा उसकी उत्पादन क्षमता भी घट जाती है, जिससे आपूर्ति कम हो पाती है।
स्थानापन्न वस्तु (substitute product) :- जब बाजार में एक वस्तु की स्थानापन्न वस्तु उपलब्ध होती है तो उस से आपूर्ति प्रभावित होती है। माना बाजार में दो वस्तुएँ A और B जो एक दूसरे की स्थानापन्न वस्तु है। यदि वस्तु A की कीमत बढ़ जाती है, ऐसी स्थिति में वह व्यवसायी उस वस्तु का उत्पादन और आपूर्ति बढ़ा देता है। जब A वस्तु की आपूर्ति बाजार में बहुत अधिक हो जाती है, तब B अपनी आपूर्ति को नहीं बढ़ा सकता क्योंकि उसकी स्थानापन्न वस्तु की मात्रा बाजार में पहले से ही अधिक मात्रा में उपलब्ध है। इसलिए वस्तु B की आपूर्ति कम करनी पड़ेगी।
सरकारी नीतियां (government policies) :- किसी उत्पादन की आपूर्ति में सरकार की नीतियों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जैसे: राजकोषीय नीति और औद्योगिक नीति, किसी उत्पाद की आपूर्ति को प्रभावित करती है। यदि सरकार किसी उत्पाद पर कर ( tax ) बढ़ा देती है, तो कर बढ़ाने से उसकी उत्पादन लागत बढ़ जाती है। तथा व्यवसायी अधिक कर न चुकाने के कारण अपना उत्पादन घटा देता है। इसके विपरीत यदि सरकार किसी उत्पाद पर कर(tax) कम करती है या सब्सिडी देती है। तो उस वस्तु की उत्पादन लागत कम हो जाती है, जिससे वह व्यवसायी उस वस्तु का उत्पादन तथा आपूर्ति बढ़ा देता है।
जलवायु एवं मौसम (Climate and Weather) :-
कृषि या किसी से संबंधित उत्पादन के लिए जलवायु बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कृषि उत्पादों का उत्पादन मौसम के हिसाब से बदलता रहता है, जैसे भारत में गर्मी के मौसम में गेहूं का उत्पादन अधिक होता है। इसलिए गर्मी के मौसम में इसकी आपूर्ति भी अधिक होगी तथा सर्दी के अंदर इसकी आपूर्ति कम हो जाएगी। तथा उसके स्थान पर अन्य मौसमी फसलों की आपूर्ति बढ़ जाएगी।
Extension or expansion of supply Cruve
आपूर्ति वक्र का विस्तार या आपूर्ति वक्र का संकुचन :-
यदि किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन के कारण उसकी आपूर्ति में परिवर्तन होता है, तो इसे "आपूर्ति का विस्तार" या "आपूर्ति का संकुचन" कहा जाता है।
आइए इसे वक्र से विस्तार पूर्वक समझते हैं -
कीमत बढ़ने से आपूर्ति में वृद्धि होती है तो वक्र में जब सेब की कीमत ₹10 थी तब आपूर्ति 100 kg होती है, लेकिन जैसे ही कीमत ₹20 हो जाती है आपूर्ति भी 200kg हो जाती है। तब आपूर्ति वक्र A से B तक विस्तारित हो जाता है। इससे इसे पूर्ति का विस्तार कहते हैं। दूसरी तरफ यदि सेब की कीमत ₹40 से घटकर ₹30 हो जाती है तो आपूर्ति भी 400 से घटकर 300kg रह जाती है तथा पूर्ति वक्र D बिंदु से C बिंदु तक संकुचित हो जाता है। इसे आपूर्ति वक्र का संकुचन कहते हैं।
Shift in supply curve
आपूर्ति वक्र में बदलाव :-
जब किसी वस्तु की आपूर्ति में परिवर्तन उसकी कीमत को छोड़कर अन्य किसी कारक से होती है। तो से आपूर्ति में बदलाव कहते हैं। उदाहरण के लिए सेब का उत्पादन करने वाला व्यवसायी उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग करके सेबों की तुड़वाई, श्रेणीरण तथा पैकिंग के लिए कम मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है, जिससे उत्पादन लागत में कमी आएगी तथा कार्य भी शीघ्र होने लगेगा ऐसी स्थिति में आपूर्ति अधिक होंगी तथा आपूर्ति वक्र एक नया आपूर्ति वक्र बना लेता है।
आइए वक्र से समझते हैं -
उत्पादन लागत में कमी तथा आपूर्ति में वृद्धि के कारण नया आपूर्ति वक्र चित्र में दर्शाए अनुसार S से बदल कर S1 बनता है। इस वक्र में उसी कीमत पर अधिक आपूर्ति प्राप्त हो रही है। पहले सेब की कीमत ₹10 थी तो आपूर्ति 100 kg होती थी, लेकिन अब उसी ₹10 कीमत में 180 kg सेब की आपूर्ति हो रही है। इस नये आपूर्ति वक्र में उसी कीमत पर अधिक आपूर्ति प्राप्त होने लगती है। इसे आपूर्ति वक्र में बदलाव (shift in supply curve) कहते हैं।


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