International monetary fund अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष : -
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जुलाई 1944 में, ब्रिटेन के वूड्स शहर समेल्लन में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने मिलकर अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था तथा संयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना का निर्णय लिया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक की स्थापना का निर्णय आर्थिक तथा मौद्रिक समस्या के समाधान के लिए उठाए गए सबसे महत्वपूर्ण कदम थे।
स्थपना दिसंबर सन 1945 मे हुई।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 1 मार्च 1947 से कार्य प्रारंभ किया।
मुख्यालय वाशिंगटन डीसी, US मे स्थित है।
प्रारंभ में सदस्य देशों की संख्या 29 थी, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की सदस्यता कोई भी देश प्राप्त कर सकता है शर्त यह है कि वह देश मुद्रा कोष के चार्टर की सभी धाराओं के पालन करने का वचन दे, आज विश्व के लगभग सभी देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सदस्य हैं।
संक्षिप्त:-
गठन 27 दिसंबर 1945
कार्य प्रारंभ 1 मार्च 1947
प्रकार अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान
मुख्यालय वाशिंगटन, डीसी यू.एस.
सदस्यता 189 देश
प्रबंध संचालक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा
आधिकारिक भाषा अंग्रेजी
Objectives of the International Monetary Fund
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के उद्देश्य :-
- अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग मे वृद्धि करना।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुविधाजनक बनाना
- ऐसे देशों के बीच विनिमय दर को स्थायित्व देना
- विश्व व्यापार में बाधक विदेशी विनिमय प्रतिबंधों को दूर करना
- बहुपक्षीय भुगतान प्रणाली का विकास करना
- सदस्य देशों की आर्थिक उन्नति में सहयोग देना
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुभाग :-
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रबंधन मे
- प्रशासक मंडल
- प्रबंध मंडल
- प्रबंध संचालक
- अन्य कर्मचारी
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्य :-
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का प्रमुख कार्य सदस्य देशों को विदेशी विनिमय संकट से उबारने का है, इसके लिए सभी देश इससे ऋण प्राप्त कर सकते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अपने सदस्य राष्ट्र मे भुगतान संतुलन बनाए रखने के लिए एक निश्चित अनुपात में ऋण दे सकता है
- यदि किसी राष्ट्र पर यदि कोई आकस्मिक संकट आ जाए तुम मुद्रा कोष उस देश को विशेष संकटकालीन ऋण उपलब्ध करवाता है।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सदस्य देशों के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता है तथा उनके अधिकारियों को मौद्रिक, राजकोषीय, सांख्यिकी कार्यों तथा आर्थिक सुधारों में प्रशिक्षण प्रदान करता है।
- यदि किसी देश की मुद्रा की बहुत अधिक देश ऋण के लिए मांग करते हैं तो कोष उस देश की मुद्रा को स्वर्ण द्वारा क्रय करके अथवा संबंधित देश से उधार लेकर ऋण चाहने वाले देशों को उपलब्ध कराता है।
- मुद्रा कोष मौसमी या सामयिक ऋण अपने सदस्य देशों को भुगतान संतुलन में मौसमी उतार-चढ़ाव को दूर करने के लिए देता है।
- अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से संपर्क कर विश्व अर्थव्यवस्था पर विभिन्न सम्मेलन में विचार-विमर्श करता है।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अपनी नीतियों के क्रियान्वयन एवं जानकारी के लिए कई पत्र-पत्रिकाये प्रकाशित करता है।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष समय-समय पर सदस्य देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न सहायता योजनाएं प्रारंभ करता है, इसमें क्षतिपूरक वित्तीय सुविधा, विस्तारित क्षतिपूरक वित्तीय सुविधा, बफर स्टॉक सुविधा, पूरक वित्तपोषण सुविधा आदि प्रमुख है।
- गरीब देशों को सस्ती दरों पर विशेष सहायता उपलब्ध कराना कोष का प्रमुख लक्ष्य है। कोष अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा विकासशील देशों को सहायता उपलब्ध कराने में व्यय करता है।
- मुद्रा कोष अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं को दूर करने तथा व्यापार में वृद्धि के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के बारे में महत्वपूर्ण बातें :-
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की कुल पूंजी सदस्य देशों के अंश के योग के बराबर होती है। प्रत्येक सदस्य देश के अंश का निर्धारण उसकी राष्ट्रीय आय, स्वर्ण, विदेशी विनिमय आदि को ध्यान में रखकर किया जाता है।
- राष्ट्र अपने अंश के निश्चित अनुपात में ऋण ले सकते हैं, कोई भी राष्ट्र अपने अंश के 125 प्रतिशत तक विदेशी मुद्राएं खरीद सकता है, परंतु 1 वर्ष में यह राशि उसके अंश के 25 प्रतिशत से अधिक न हो।
- कोष ने यह प्रतिबंध भी लगा रखा है कि किसी भी समय को उसके पास किसी देश की मुद्रा का संग्रह उस देश के अंश के दुगुने से अधिक नहीं होना चाहिए क्योंकि मुद्रा कोष के पास सदस्य देश के अंश का 75% भाग तो पहले से ही होता है अतः सदस्य देश अधिक से अधिक अपने अभ्यांश का 125% के बराबर ऋण ले सकते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अल्पकालीन व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऋण देती है इसलिए ऋण की अधिकतम अवधि 5 वर्ष तक तय की गई है।
- यदि किसी मुद्रा की मांग बढ़ती जा रही है तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष उसे दुर्लभ मुद्रा घोषित कर देता है। ऐसी स्थिति में कोष सदस्य राष्ट्र को दुर्लभ मुद्रा वाले देश के साथ व्यापार पर अस्थाई प्रतिबंध लगाने की अनुमति प्रदान करता है।
- दुर्लभ मुद्रा के ठीक विपरीत अगर किसी मुद्रा की मात्रा आवश्यकता से अधिक हो गई है और उसकी मांग नहीं है तो ऐसी स्थिति में तरलता को बनाए रखने के लिए कोष उन देशों को अपनी मुद्रा स्वर्ण अथवा SDR से पुन: खरीदने की सलाह दे सकता है।



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
If you have any doubt please write in comment box