सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Gross Domestic Product सकल घरेलू उत्पाद

Concept of GDP
Gross
Domestic Product of
सकल घरेलू उत्पाद
राष्ट्रीय आय का अध्ययन प्राचीन काल से ही अर्थशास्त्रियों की रुचि रही है। सन 1937 में अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के अर्थशास्त्री साइमन कुजनेटस ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस में सकल घरेलू उत्पाद ज्ञात करने का मूल सूत्र प्रस्तुत किया जिसमें 1929-35 काल में राष्ट्रीय आय का अध्ययन किया । द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सन 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन जिसमें विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की स्थापना की गई तथा सन 1945 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF ने जीडीपी को देश की अर्थव्यवस्था को मापने का मुख्य साधन घोषित कर दिया। किसी भी राष्ट्र के आर्थिक विकास का आंकलन करने में जीडीपी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जीडीपी से हमें यह भी पता लग सकता है की अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है या कमी।

What is GDP?
सकल घरेलू उत्पाद क्या है?
किसी राष्ट्र द्वारा एक निश्चित समय अवधि में देश की सीमा के भीतर उत्पादित समस्त तैयार ( finished ) वस्तुओ एवम् सेवाओं का मौद्रिक या बाजार मूल्य का योग सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है।

अधिकतर देशों में निश्चित समयावधि को एक वर्ष लिया जाता है। तथा कुछ राष्ट्रों में जीडीपी की गणना तिमाही जाती हैं। भारत में जीडीपी तिमाही ज्ञात की जाती है। तथा बाद में इन्हें जोड़ कर वार्षिक जीडीपी ज्ञात कर ली जाती है।
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) किसी देश में उत्पादित सभी वस्तुओ एवं सेवाओं का कुल मूल्य है, भले ही उसके नागरिकों, विदेशियों या वहां की सरकार ने इसका उत्पादन किया हो। अर्थात देश की सीमा के भीतर चाहे वह विदेशी व्यक्ति हो, विदेशी कंपनी हो, सरकार हो या देश के नागरिक हो यदि किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं, तो उसे जीडीपी में शामिल किया जाता है।
दोहरी गणना से बचने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में हमेशा अंतिम उत्पाद (finished good) या उपभोग की जाने वाली वस्तुओं को ही शामिल किया जाता है।
 सकल घरेलू उत्पाद ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित घटकों का योग किया जाता है -

जीडीपी = निजी उपभोग + व्यवसायिक निवेश + सरकारी निवेश + शुद्ध निर्यात
सूत्र में व्यक्त:

GDP = C + I + G + (X - M)

Components of GDP
सकल घरेलू उत्पाद के घटक
(i)  निजी उपभोग ( C )
(ii)  व्यवसायी निवेश  ( I )
(iii)  सरकारी निवेश    ( G )
(iv)  शुद्ध निर्यात      ( X-M )

(i)  निजी उपभोग ( C ) :-  व्यक्तिगत उपभोग व्यय में सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर होने वाला समस्त व्यय का योग किया जाता है। अर्थात उपभोक्ता द्वारा उन सभी वस्तुओं पर किया गया व्यय जो उपभोग की गई है अथवा उपभोग करने के लिए अधिग्रहण की गई है। इन्हें पुन्न: बेचा नहीं जाता।अंतिम वस्तुओं को भी दो भागों में विभाजित किया जाता है। प्रथम टिकाऊ  वस्तु जैसे कार, स्कूटर, फ्रिज, फर्नीचर इत्यादि। द्वितीय गैर टिकाऊ वस्तु जैसे पेट्रोल, दूध, सब्जी, फल इत्यादि। वस्तुओं के अलावा सेवाओं में किया गया व्यय भी सकल राष्ट्रीय उत्पाद में सम्मिलित किया जाता है। जैसे अध्यापक,वकील, डॉक्टर आदि की सेवा में किया गया खर्च को सम्मिलित किया जाता है। अतः देश में एक वर्ष में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं पर अंतिम उपभोक्ता द्वारा किया गया व्यय सकल राष्ट्रीय उत्पाद का प्रमुख अंग है।
(ii)  व्यवसायी निवेश  ( I ) 
जब कोई व्यवसाय व्यवसायिक गतिविधियों के लिए धन का निवेश करता है। जैसे मशीनरी, यंत्र ख़रीदने तथा उद्योग को स्थापित करना आदि शामिल होते हैं। रिहायशी मकान खरीदनाभी व्यवसायी निवेश में शामिल किया जाता है। व्यवसायी निवेश सकल घरेलू उत्पाद का एक महत्वपूर्ण घटक है, क्योंकि इससे देश की उत्पादक क्षमता बढ़ती है।
(iii)  सरकारी निवेश   ( G ) 
सरकार द्वारा किए जाने वाले सभी प्रकार के व्यय जिससे देश के आर्थिक व सामाजिक विकास को बढ़ावा मिलता है।सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर, राज्य स्तर एवं स्थानीय स्तर जो भी व्यय करती है। जैसे सरकारी कर्मचारियों को वेतन जिसमें पुलिस, शिक्षक, चिकित्सक अन्य कर्मचारी एवं सरकार द्वारा क्रय की गई वस्तुएं जैसे राइफल, लड़ाकू विमान, भवन आदि को सकल राष्ट्रीय उत्पाद में जोड़ दिया जाता है। परंतु सरकार द्वारा अपने लोक कल्याणकारी कार्य हेतु जो स्थानांतरण भुगतान किए जाते हैं, उन्हें राष्ट्रीय उत्पादन का अंग नहीं माना जाता जैसे बुढ़ापा पेंशन, विधवा पेंशन, गरीब कल्याण भुगतान आदि।
(iv)  शुद्ध निर्यात  ( X-M ) 
जब कोई राष्ट्र अपने कुल निर्यात में से कुल आयात को घटाता है तो उसे शुद्ध निर्यात कहते हैं। निर्यात से हमारा अभिप्राय विदेशों को बेची जाने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं से हैं। आयात से हमारा अभिप्राय देश में विदेशों से मंगाई गई वस्तुओं एवं सेवाओं से है। शुद्ध निर्यात से अभिप्राय कुल निर्यात एवं कुल आयात की राशि का अंतर है। यदि देश के कुल निर्यात का मूल्य कुल आयात के मूल्य से अधिक है, तो शुद्ध निर्यात धनात्मक होंगे, जिससे सकल राष्ट्रीय उत्पाद में बढ़ोतरी होगी इसके विपरीत यदि देश में आयात अधिक होंगे एवं निर्यात की मात्रा कम होगी तो सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कमी आएगी। वर्तमान में निर्यात का सकल घरेलू उत्पाद में बहुत बड़ा योगदान है।

सकल घरेलू उत्पाद के प्रकार
किसी देश की सकल राष्ट्रीय उत्पाद की राशि में वृद्धि दो कारणों से संभव होती है, प्रथम देश में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा में वृद्धि हो जाए और दूसरी इन वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में वृद्धि हो जाए।
मुख्य रूप से सकल घरेलू उत्पाद को दो प्रकारों में विभाजित किया गया है। एक नाम मात्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) तथा वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद।
Nominal GDP
नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद 
जब सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना चालू बाजार की कीमतों की की जाती है। तो उसे नाममात्र सकल राष्ट्रीय उत्पाद अथवा चालू कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद की संज्ञा दी जाती है। दूसरे शब्दों में, यह मुद्रास्फीति या बढ़ती कीमतों के प्रभाव को अलग नहीं करता है। इससे यह स्पष्ट नहीं होता की जीडीपी में वृद्धि वस्तु एवं सेवा के उत्पादन में वृद्धि के कारण हुई है,अथवा कीमतों में वृद्धि होने के कारण हुई हैं।

Real GDP
वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद 
वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद आर्थिक उत्पादन का एक उचित माप है, जो मुद्रास्फीति या अपस्फीति के प्रभाव को दर्शाता है । जब सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना पूर्व निर्धारित कीमतों के द्वारा की जाती है। जिस से महंगाई और मंदी से कीमतों में हो रहे परिवर्तन के कारण राष्ट्रीय उत्पाद पर पड़ने वाले प्रभाव को खतम किया जाता है । इस प्रकार वास्तविक सकल राष्ट्रीय उत्पाद देश की उत्पादन क्षमता में हुए वास्तविक परिवर्तन को व्यक्त करता है।

 Next pages


For daily updates with our informations please follow us.











टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Equilibrium of demand and supply मांग और पूर्ति में संतुलन

Equilibrium demand and supply   मांग और पूर्ति में संतुलन :-  बाजार संतुलन वह स्थिति है जब मांग एवं आपूर्ति संतुलन की स्थिति में होते हैं अर्थात मांग वक्र तथा आपूर्ति वक्र एक दूसरे को एक बिंदु पर काटते हैं।  बाजार में व्यक्ति किसी वस्तु की निश्चित मात्रा को एक निश्चित मूल्य पर ख़रीदना चाहते हैं।तथा उसी कीमत पर उतनी मात्रा कोई फार्म या व्यक्ति बेचने की इच्छा रखता हैं। तो वह कीमत बाजार कि संतुलित कीमत कहलाती है। आसान शब्दों में कहें तो बाजार संतुलन में जिस कीमत पर मांग की मात्रा और आपूर्ति की मात्रा बराबर हो जाती हैं, उसे बाजार संतुलन या बाज़ार कीमत निर्धारण कहते हैं। आइए इसे सारणिक रूप में देखते हैं - सेब की कीमत  मांग की मात्रा kg आपूर्ति की मात्रा kg ₹10 500 100 ₹20 400 200 ₹30 300 300 ₹40 200 400 ₹50 100 500 सारणी से स्पष्ट हो रहा है। कि सेब की कीमत जैसे-जैसे बढ़ रही है उसकी मांग वैसे-वैसे कम हो रही है दूसरी तरफ आपूर्ति बढ़ रही है। सारणी से हम देख पा रहे हैं कि अलग-अलग कीमत पर मांग और आपूर्ति की मा...

International trade principles in hindi अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सिद्धांत

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सिद्धांत:-   अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांतों में रिकार्डो द्वारा प्रतिपादक तुलनात्मक लागत सिद्धांत सबसे प्रमुख माना गया है अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांतों को इन प्रश्नों का उत्तर देना होता है जैसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का आधार क्या है तथा किन देशों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार संभव होता है तथा आपस में व्यापार करने वाले राष्ट्रों को क्या लाभ होते हैं और इन लाभों का वितरण कैसे किया जाए|  अतःएडम स्मिथ के मत के अनुसार व्यापार का कारण दो देशों में वस्तुओं की उत्पादन लागत में निरपेक्ष अंतर है| डेविड रिकार्डो ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में निरपेक्ष लागत अंतर को अपर्याप्त बताया और यह तर्क दिया कि दो देशों के बीच व्यापार का आधार सापेक्ष या तुलनात्मक लागत अंतर है इन दोनों अर्थशास्त्रियों के विचारों में यह समानता है कि दोनों उत्पादन लागत में केवल श्रम लागत ही मानते हैं| प्रस्तुत इकाई में हम सर्व प्रथम श्रम लागत सिद्धांत के आधार पर प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों एडम स्मिथ एवं रिकार्डों के सिद्धांत की व्याख्या प्रस्तुत करेंगे| एडम स्मिथ का निरपेक्ष लागत ...

Law of supply आपूर्ति का नियम

           Law of demand and supply Law of supply आपूर्ति का नियम :- आपूर्ति का नियम यह प्रदर्शित करता है, कि जब अन्य सभी कारक स्थिर हो तब किसी वस्तु की कीमत और उसकी आपूर्ति के बीच सीधा संबंध होता है। यानी जब कीमत बढती है, तो उसकी आपूर्ति भी बढती है। और जब उसकी कीमत कम होती है तो उसकी आपूर्ति भी कम हो जाती है। अर्थात अलग-अलग कीमत पर विक्रेता अपने उत्पादन की अलग-अलग मात्रा की आपूर्ति करने की प्रवृत्ति रखते है। इसे आपूर्ति का नियम कहते हैं। मांग के नियम में हमने देखा की कीमत बढ़ने से उसकी मांग में कमी आ जाती है। लेकिन पूर्ति के नियम में यह बिल्कुल उल्टा है।क्योंकि मांग के नियम में सीधे उपभोक्ता होते हैं, जो कीमत बढ़ने पर मांग कम कर देते हैं, लेकिन आपूर्ति के नियम में औद्योगिक एवं व्यवसायी व्यक्ति होते हैं। जिन्हें कीमत बढ़ने पर अधिक लाभ होता है, इसलिए वह और अधिक उत्पादन करते हैं तथा अधिक आपूर्ति करते हैं। आइये हम इसे एक सारणिक रूप में समझते हैं -     कीमत ₹ आपूर्ति मात्रा kg       1...